auto_awesome एक नज़र में (Major Highlights)
▪️जिला प्राथमिक शिक्षक संघ ने 2011 से पहले नियुक्त शिक्षकों के लिए टीईटी (TET) अनिवार्य किए जाने के विरोध में सासाराम के सांसद को ज्ञापन सौंपा।
▪️इस नीतिगत निर्णय से देशभर के लगभग 30 लाख शिक्षकों की नौकरी और प्रोन्नति पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ने की आशंका है।
▪️पुरानी सेवा शर्तों पर नियुक्त हुए और वर्षों से सेवाएं दे रहे अनुभवी शिक्षकों को अचानक नौकरी जाने का डर सता रहा है, जिससे वे भारी मानसिक तनाव से गुजर रहे हैं।
▪️सांसद मनोज कुमार ने इस मुद्दे को संसद के आगामी मानसून सत्र में जोर-शोर से उठाने का आश्वासन दिया है।

”शिक्षा का अधिकार (संशोधन) 2017 के तहत 2011 से पूर्व नियुक्त शिक्षकों के लिए टीईटी अनिवार्य किए जाने से शिक्षकों में भारी रोष, मानसून सत्र में गूंजेगा मुद्दा।“
सासाराम के सर्किट हाउस में इस सप्ताह रोहतास जिले के दर्जनों प्राथमिक शिक्षक अपने भविष्य को लेकर गहरी चिंता के साथ पहुंचे। जिला प्राथमिक शिक्षक संघ के प्रधान सचिव अखिलेश्वर कुमार सिंह के नेतृत्व में इस शिष्टमंडल ने स्थानीय सांसद मनोज कुमार (मनोज राम भारती) को एक विस्तृत ज्ञापन सौंपा। उनकी मुख्य मांग 2011 से पहले नियुक्त शिक्षकों को शिक्षक पात्रता परीक्षा (टीईटी) की अनिवार्यता से पूरी तरह मुक्त रखना है।
एक जिले के शिक्षकों से शुरू हुई यह मांग दरअसल एक बड़े राष्ट्रीय संकट की ओर इशारा कर रही है। संघ के कार्यकारी अध्यक्ष सुरेंद्र प्रसाद सिंह ने स्थिति की गंभीरता को स्पष्ट करते हुए कहा, “भारत सरकार के नीतिगत निर्णय व सुप्रीम कोर्ट के न्यायादेश के बाद देशभर के करीब 30 लाख शिक्षकों पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ने की आशंका है।”
क्या है पूरा विवाद और 2017 का संशोधन?
वर्तमान व्यवस्था के अनुसार, पांच वर्ष से अधिक की सेवा पूरी कर चुके शिक्षकों को अब सेवा में बने रहने और आगे की प्रोन्नति के लिए टीईटी (TET) उत्तीर्ण करना अनिवार्य कर दिया गया है। शिक्षकों का तर्क है कि जब 2010 में शिक्षा का अधिकार (RTE) अधिनियम 2009 के नियम लागू हुए थे, तब राष्ट्रीय अध्यापक शिक्षा परिषद (NCTE) ने यह स्पष्ट किया था कि अधिनियम के प्रभावी होने से पूर्व नियुक्त शिक्षकों पर टीईटी पास करने की बाध्यता लागू नहीं होगी।
लेकिन, शिक्षा का अधिकार अधिनियम (संशोधन) 2017 लागू होने के बाद यह स्थिति पूरी तरह बदल गई है। संघ का स्पष्ट कहना है कि 2011 से पहले नियुक्त सभी शिक्षकों की बहाली तत्कालीन विभागीय सेवा शर्तों के अनुरूप ही हुई थी। इन शिक्षकों के पास वर्षों का लंबा शिक्षण अनुभव है और वे समय-समय पर जरूरी विभागीय प्रशिक्षण भी प्राप्त करते रहे हैं। नई अनिवार्यता के कारण अब इन्हीं अनुभवी शिक्षकों की नौकरी पर अचानक तलवार लटक गई है।
शिक्षकों में मानसिक तनाव और मानसून सत्र से उम्मीद
इस फरमान ने पुराने शिक्षकों के सामने एक अप्रत्याशित और गहरा संकट खड़ा कर दिया है। ज्ञापन सौंपने वाले शिष्टमंडल के अनुसार, सरकार के इस अचानक लिए गए निर्णय से शिक्षकों में भारी मानसिक तनाव पैदा हो गया है, जिसका सीधा और नकारात्मक असर स्कूलों में पठन-पाठन की गुणवत्ता पर भी पड़ सकता है।
सांसद मनोज कुमार ने शिक्षकों की समस्या को ध्यानपूर्वक सुना और उन्हें एक बड़ा आश्वासन दिया। उन्होंने वादा किया है कि शिक्षकों की इन वाजिब मांगों और टीईटी अनिवार्यता से जुड़ी व्यावहारिक समस्याओं को वह संसद के आगामी मानसून सत्र में प्रमुखता से उठाएंगे।
इस अहम मौके पर सर्किट हाउस में विजय शंकर प्रसाद, राज्य प्रतिनिधि शशांक शिव शेखर, मुनमुन पंडित, बिंदेश्वरी पाल, कमलेश कुमार, वैकुंठ राम, राकेश रंजन वर्मा, शशि भूषण, विकास रंजन और दिनेश पासवान सहित कई अन्य शिक्षक व पदाधिकारी उपस्थित थे।