​सुपौल: 266 बच्चों पर सिर्फ एक शिक्षक, किशोरी संस्कृत विद्यालय की बदहाली

updateUpdated: July 6, 2026 at 5:50 pm schedule 3 min read
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auto_awesome एक नज़र में (Major Highlights)

▪️सुपौल के एक सरकारी संस्कृत विद्यालय में 266 बच्चों को पढ़ाने और स्कूल का पूरा प्रशासन संभालने के लिए केवल एक प्रतिनियुक्त शिक्षक बचा है।
▪️कक्षा 1 से 8 तक के 266 नामांकित छात्रों के लिए सिर्फ 1 शिक्षक है, जबकि प्रतिदिन 140-150 बच्चे उपस्थित होते हैं।
▪️शिक्षकों की भारी कमी के कारण आर्थिक रूप से कमजोर ग्रामीण बच्चों की शैक्षणिक गुणवत्ता और भविष्य खतरे में है।
▪️शिक्षा विभाग के अधिकारियों को सूचित कर दिया गया है और विभागीय कार्रवाई की प्रक्रिया चल रही है।

बिहार के सुपौल स्थित किशोरी संस्कृत विद्यालय में 266 छात्रों को पढ़ाने के लिए सिर्फ एक शिक्षक है। जानें कैसे यह बदहाली बच्चों का भविष्य बर्बाद कर रही है।

प्रतापगंज के इस विद्यालय में बच्चों का भविष्य एक शिक्षक के भरोसे है। मिड-डे मील से लेकर 8 कक्षाओं की पढ़ाई का सारा जिम्मा एक ही व्यक्ति पर है।

Byline: विशेष संवाददाता

​266 नामांकित छात्र, 8 अलग-अलग कक्षाएं और इन सबको संभालने के लिए सिर्फ एक शिक्षक। बिहार के सुपौल जिले के प्रतापगंज स्थित किशोरी प्राथमिक सह मध्य संस्कृत विद्यालय की यह जमीनी हकीकत, सरकारी स्कूलों में गुणवत्तापूर्ण शिक्षा देने के दावों की पोल खोल रही है।

​वर्ष 1978 में स्थापित तेकुना पंचायत के इस विद्यालय में शिक्षा व्यवस्था पूरी तरह से चरमरा गई है। वर्ष 2022 में स्कूल के स्थायी प्रधान के सेवानिवृत्त होने के बाद से यहां एक भी स्थायी शिक्षक की नियुक्ति नहीं हुई है। वर्तमान में दूसरे पंचायत से प्रतिनियुक्त होकर आए शिक्षक अभय कुमार अरुण ही अकेले पूरे स्कूल का संचालन कर रहे हैं।

​प्रतिदिन औसतन 140 से 150 छात्र-छात्राएं स्कूल आते हैं। सुबह स्कूल का ताला खोलने से लेकर शाम को बंद करने तक, प्रार्थना सत्र से लेकर छुट्टी की घंटी तक, हर जिम्मेदारी एक ही व्यक्ति को निभानी पड़ रही है।

​पढ़ाई से ज्यादा कागजी कामों का बोझ

​एक शिक्षक के लिए आठ कक्षाओं को एक साथ पढ़ाना वैसे ही किसी चुनौती से कम नहीं है, लेकिन अभय कुमार अरुण की परेशानियां केवल पढ़ाने तक सीमित नहीं हैं। पठन-पाठन के अलावा उन्हें मध्याह्न भोजन (MDM) योजना का संचालन, खेलकूद गतिविधियां, सरकारी योजनाओं का क्रियान्वयन और स्कूल के दस्तावेजों का रखरखाव भी करना पड़ता है। शिक्षा विभाग के ऑनलाइन पोर्टल पर डेटा अपलोड करने जैसी तमाम तकनीकी जिम्मेदारियां भी उन्हीं के कंधों पर हैं।

​स्थानीय अभिभावकों का कहना है कि एक शिक्षक के लिए आठ अलग-अलग कक्षाओं को समुचित समय देना व्यावहारिक रूप से असंभव है। इसका सीधा असर बच्चों की सीखने की क्षमता पर पड़ रहा है। सबसे ज्यादा नुकसान उन आर्थिक रूप से कमजोर ग्रामीण परिवारों के बच्चों का हो रहा है, जिनके पास इसके अलावा कोई दूसरा विकल्प मौजूद नहीं है।

​क्या कह रहे हैं अधिकारी?

​प्रशासनिक स्तर पर इस गंभीर समस्या की जानकारी होने के बावजूद जमीनी हालात जस के तस बने हुए हैं।

​प्रतापगंज के प्रभारी बीईओ (BEO) सितेश कुमार झा ने इस बदहाली पर प्रतिक्रिया देते हुए कहा, “विद्यालय में शिक्षकों की कमी की जानकारी संबंधित अधिकारियों को उपलब्ध करा दी गई है”। उन्होंने आगे बताया कि विभागीय स्तर पर आवश्यक कार्रवाई की प्रक्रिया चल रही है।

​सवाल यह उठता है कि जब तक विभाग की यह कागजी ‘प्रक्रिया’ पूरी होगी, तब तक इन 266 बच्चों के भविष्य का जो नुकसान हो रहा है, उसकी भरपाई कौन करेगा?

Prabhanjan

verifiedHead Teacher and Educational Content Writer

Expertise: MA, D.El.Ed

Head Teacher in Primary School Bihar

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