जोकीहाट में 4 माह से MDM फंड और मानदेय अटका, बंद होने के कगार पर मिड-डे मील

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auto_awesome एक नज़र में (Major Highlights)

◾️जोकीहाट प्रखंड के सरकारी स्कूलों में 4 से 5 माह से एमडीएम राशि और रसोइयों के मानदेय का भुगतान न होने से योजना बंद होने के कगार पर पहुंच गई है।
◾️4 से 5 माह से एमडीएम परिवर्तन मूल्य और रसोइयों का मानदेय शून्य भुगतान।
◾️दुकानदारों द्वारा उधार राशन बंद किए जाने से बच्चों के पोषण पर सीधा खतरा मंडरा रहा है और अल्प-वेतनभोगी रसोइयां भुखमरी झेल रही हैं।
◾️जिला प्रशासन से तत्काल आवंटन की मांग; डीपीओ ने आवंटन प्राप्त होते ही भुगतान करने की बात कही है।

दुकानदारों ने उधार राशन देने से खींचे हाथ, मानसिक तनाव में प्रधानाध्यापक; डीपीओ बोले- आवंटन आते ही होगा भुगतान।

​सरकारी फाइलों में प्राथमिक और मध्य विद्यालयों के बच्चों को हर दिन मेन्यू के मुताबिक गरम और पौष्टिक भोजन परोसने के सख्त निर्देश दर्ज हैं। धरातल की हकीकत यह है कि इन विद्यालयों के रसोईघरों के लिए पिछले चार महीनों से सरकारी खजाने से फूटी कौड़ी भी जारी नहीं की गई है।

​बिहार के अररिया जिले अंतर्गत जोकीहाट प्रखंड में प्रधानमंत्री पोषण शक्ति निर्माण (मध्याह्न भोजन योजना) गंभीर आर्थिक संकट के भंवर में फंस चुकी है। स्कूलों को मिलने वाली परिवर्तन लागत (कन्वर्जन कॉस्ट) तो रुकी ही है, साथ ही नाममात्र के मानदेय पर बच्चों का खाना पकाने वाली रसोइयों को भी पिछले चार से पांच महीनों से मानदेय नहीं मिला है।

​उधारी और व्यक्तिगत कर्जे के सहारे चल रही यह पूरी व्यवस्था अब कभी भी दम तोड़ सकती है।

​उधारी का राशन बंद, प्रधानाध्यापकों के सामने धर्मसंकट

​विद्यालयों में बच्चों की उपस्थिति और पोषण के नियम तय हैं, और तय मेन्यू के अनुसार रोज भोजन उपलब्ध कराने की सीधी जवाबदेही प्रधानाध्यापकों (HM) पर डाली गई है। पिछले पांच महीनों से राशि न आने की स्थिति में प्रधानाध्यापक स्थानीय किराना दुकानदारों से चावल के अलावा दाल, तेल, मसाले और जलावन जैसी जरूरी सामग्रियां उधारी पर उठाकर योजना को किसी तरह घसीट रहे थे।

​अब दुकानदारों ने भी साफ मना कर दिया है।

​लगातार बढ़ते बकाये के चलते स्थानीय व्यापारियों ने नया राशन देने से हाथ खड़े कर दिए हैं। नतीजा यह है कि हर सुबह विद्यालय खुलने के साथ ही बच्चों के खाने का इंतजाम करना शिक्षकों के लिए भारी मानसिक तनाव और सिरदर्द बन चुका है।

​नाममात्र का मानदेय, वह भी महीनों से गायब

​योजना की सबसे दयनीय तस्वीर वे रसोइयां हैं, जो सुबह से दोपहर तक चूल्हा फूंकती हैं। बेहद मामूली मानदेय पर निर्भर इन कामगारों के घरों में अब भुखमरी जैसी नौबत आन पड़ी है। लगातार पांच महीने से पारिश्रमिक न मिलने के कारण परिवार का भरण-पोषण करना और बीमारी में दवा का खर्च उठाना इनके लिए असंभव हो चुका है।

​कई रसोइयों का कहना है कि वे हर सुबह इस उम्मीद में स्कूल पहुंचती हैं कि आज उनके बैंक खाते में पैसा आ जाएगा, लेकिन हर महीने उन्हें केवल दिलासा और आश्वासन ही थमाया जाता है।

​योजना ठप होने की चेतावनी, डीपीओ का औपचारिक जवाब

​जिले के स्थानीय शिक्षकों ने स्थिति की गंभीरता को देखते हुए जिला प्रशासन से तुरंत हस्तक्षेप करने और राशि का आवंटन कराने की मांग उठाई है। शिक्षकों का कहना है कि यदि विभागीय स्तर पर लंबित एमडीएम राशि और रसोइयों का बकाया जल्द जारी नहीं हुआ, तो स्कूलों में दोपहर का भोजन पकाना पूरी तरह ठप हो जाएगा।

​इधर, पूरे मामले पर जब मध्याह्न भोजन योजना के जिला कार्यक्रम पदाधिकारी (DPO) से पूछा गया, तो उन्होंने कहा: “आवंटन आने के बाद भुगतान कर दिया जाएगा।”

​प्रशासनिक स्तर पर इस आवंटन का इंतजार कब खत्म होगा, इसका जवाब फिलहाल किसी के पास नहीं है।

Ravi Kumar

verifiedHead Teacher and Educational Content Writer

Expertise: MA, D.El.Ed

Head Teacher in Primary School Bihar 13 year of teaching experience in multiple government school of Bihar.

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