EPFO New Rules: बेसिक सैलरी का 12% पीएफ कटना अब अनिवार्य नहीं, ₹1800 का नया नियम समझें

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auto_awesome एक नज़र में (Major Highlights)

▪️सरकार ने ईपीएफ में बेसिक सैलरी के 12% की अनिवार्य कटौती को खत्म कर अधिकतम ₹1800 की सीमा तय कर दी है।
▪️29 जून 2026 को भारत भर में 'नई कर्मचारी भविष्य निधि योजना, 2026' के तहत लागू।
▪️₹1800 अधिकतम अनिवार्य पीएफ अंशदान, और दावों के निपटारे के लिए 20 दिन की सख्त समयसीमा।
▪️कर्मचारियों की इन-हैंड सैलरी बढ़ सकती है, लेकिन यदि वे स्वेच्छा से ज्यादा पीएफ नहीं कटवाएंगे, तो उनका रिटायरमेंट कॉर्पस काफी घट जाएगा।
▪️कंपनियां अब कर्मचारियों की सहमति से उनके CTC और इन-हैंड सैलरी स्ट्रक्चर में बदलाव करना शुरू करेंगी।

​”केंद्र सरकार ने ‘कर्मचारी भविष्य निधि योजना 2026’ अधिसूचित कर दी है। अब ₹1800 से ऊपर का पीएफ अंशदान स्वैच्छिक होगा, जिससे आपकी ‘इन-हैंड’ सैलरी बढ़ सकती है।

​₹1,800. अब किसी भी कंपनी के लिए हर महीने आपके वेतन से अनिवार्य रूप से कटने वाली पीएफ (PF) की यह अधिकतम रकम है। केंद्र सरकार द्वारा 29 जून 2026 को नई ‘कर्मचारी भविष्य निधि योजना, 2026’ अधिसूचित करने के बाद, अब करीब 8 करोड़ कर्मचारियों की बेसिक सैलरी का 12% अनिवार्य रूप से पीएफ में डालना कानूनी रूप से जरूरी नहीं रह गया है।

​पुराने नियम (ईपीएफ योजना 1952) की जगह लेने वाले इस नए बदलाव ने स्पष्ट कर दिया है कि अनिवार्य कर्मचारी योगदान केवल 15,000 रुपये की वैधानिक वेतन सीमा से जुड़ा होगा। इसका सीधा गणित यह है कि 15 हजार रुपये का 12% यानी सिर्फ ₹1,800 ही ईपीएफ अंशदान के लिए जरूरी है। इससे अधिक का योगदान अब तभी जारी रह सकता है, जब कर्मचारी और कंपनी स्वेच्छा (voluntarily) से ऐसा करना चाहें।

​इसका असर आपकी जेब पर दो तरह से पड़ेगा।

​चार्टर्ड एकाउंटेंट अभय शर्मा द्वारा दी गई जानकारी और उपलब्ध रिपोर्ट के विश्लेषण के अनुसार, सबसे बड़ा फायदा यह है कि आपकी इन-हैंड (in-hand) सैलरी बढ़ सकती है। उदाहरण के लिए, यदि किसी की बेसिक सैलरी 30,000 रुपये है, तो ज्यादातर कंपनियां 12% के हिसाब से 3,600 रुपये काटती थीं। नए नियम के बाद इसमें से सिर्फ ₹1,800 काटना ही कानूनी बाध्यता है। बाकी बचे 1,800 रुपये कर्मचारी की मर्जी और कंपनी की नीति के आधार पर सीधे सैलरी में जुड़कर मिल सकते हैं।

​कंपनियों को कानूनी राहत, लेकिन भविष्य की बचत पर खतरा

​सरकार का इस बदलाव के पीछे मकसद दशकों पुराने और उलझे हुए ईपीएफ कानून को नए श्रम कानूनों (Labor Codes) के हिसाब से साफ-सुथरा बनाना है। इससे कंपनियों पर कानूनी बोझ कम होगा और ईपीएफ से जुड़े विवाद घटेंगे। जिन कंपनियों पर ज्यादा सैलरी वाले कर्मचारियों का पूरे 12% के हिसाब से पीएफ काटने का दबाव था, वे अब राहत महसूस करेंगी।

​लेकिन इस फैसले का एक दूसरा पहलू भी है।

​यदि कोई कर्मचारी सिर्फ ₹1,800 ही पीएफ में डालेगा, तो रिटायरमेंट तक जमा होने वाली रकम पहले से बहुत कम हो जाएगी। पीएफ पर लगभग 8.25% का सुरक्षित ब्याज मिलता है। असली खतरा उन कर्मचारियों के लिए है जो ज्यादा ‘टेक-होम’ सैलरी के लालच में स्वेच्छा से कम पीएफ का विकल्प चुनेंगे, क्योंकि इससे कंपाउडिंग का लाभ छिन जाएगा। हालांकि, जो कर्मचारी चाहें, वे पहले जितना ही पैसा जमा करना जारी रख सकते हैं।

​दावों के निपटारे के लिए 20 दिन की ‘डेडलाइन’

​नए नियमों में ईपीएफओ अधिकारियों की जवाबदेही भी तय की गई है। अब पीएफ निकासी, पेंशन या बीमा का दावा 20 दिन के भीतर निपटाना अनिवार्य होगा।

​बिना किसी ठोस वजह के देरी होने पर सीधे कमिश्नर पर कार्रवाई होगी। दंडात्मक कदम के तौर पर 12% सालाना ब्याज उस जिम्मेदार अधिकारी की सैलरी से काटा जाएगा।

​सैलरी स्ट्रक्चर में यह बदलाव रातों-रात सभी जगह लागू नहीं होगा। यह खास तौर पर उन कंपनियों में दिखेगा जो सीटीसी (CTC) पैकेज तय करके सैलरी देती हैं।

Siddharth

verifiedManager and Content Writer

Expertise: B.Tech and MBA in IT

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