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Updated information regarding this news story (इस न्यूज़ (खबर) की अपडेटेड जानकारी): बिहार में पहली से पांचवीं तक पढ़ाई जाएंगी क्षेत्रीय भाषाएं, शिक्षा विभाग की बैठक में कई बड़े फैसले
auto_awesome एक नज़र में (Major Highlights)
◾️बिहार सरकार ने शिक्षक स्थानांतरण नीति में संशोधन करते हुए स्वैच्छिक तबादला पाने वाले शिक्षकों के लिए नए स्कूल में ज्वाइनिंग की अनिवार्यता खत्म कर दी है; असुविधा होने पर शिक्षक पुराने विद्यालय में बने रह सकते हैं।
◾️5 वर्ष से अधिक सेवा वाले वरीय शिक्षकों को सरप्लस मानने की बाध्यकारी शर्त को समाप्त किया जा रहा है; कनिष्ठ शिक्षक अब अधिशेष दायरे में आएंगे।
◾️जबरन पदस्थापना और दूर-दराज के स्कूलों में जाने का डर समाप्त होगा; शिक्षकों को अपनी पसंद का स्कूल न मिलने पर वर्तमान पद सुरक्षित रखने का अधिकार मिलेगा।
◾️शिक्षा विभाग द्वारा ई-शिक्षाकोष पोर्टल पर संशोधित नियमों के तहत स्कूल चयन और म्यूचुअल ट्रांसफर के लिए नया विकल्प विंडो खोला जाएगा।

शिक्षा मंत्री मिथिलेश तिवारी का बड़ा एलान—हाईकोर्ट में मामला जाने के बाद बदला सरप्लस फॉर्मूला, सीनियर शिक्षकों को राहत और कनिष्ठों पर लागू होंगे नए नियम।
सरकारी सेवा में स्थानांतरण का मतलब अमूमन नई जगह पर अनिवार्य आमद माना जाता है। आदेश आया तो जाना ही होगा। लेकिन बिहार के सरकारी विद्यालयों के शिक्षकों के लिए यह सख्त प्रशासनिक नियम अब पलटने जा रहा है।
यदि किसी शिक्षक ने अपनी मर्जी से तबादले का आवेदन किया और नई पोस्टिंग उसकी उम्मीदों या सहूलियतों के अनुकूल नहीं बैठी, तो उस पर नए विद्यालय में जाने का कोई दबाव नहीं रहेगा। शिक्षक चाहे तो बेझिझक अपने पुराने विद्यालय में ही बना रह सकता है।
शिक्षा मंत्री मिथिलेश तिवारी ने इस बहुप्रतीक्षित नीतिगत फेरबदल की पुष्टि करते हुए साफ कर दिया है कि स्वैच्छिक स्थानांतरण (Voluntary Transfer) की पूरी प्रक्रिया में नए स्कूल में ज्वाइनिंग की अनिवार्यता खत्म की जा रही है। व्यवस्था ऐसी गढ़ी जा रही है जिससे शिक्षक को किसी भी हाल में अनचाही दूरी या प्रशासनिक विवशता का शिकार न होना पड़े।
नया स्कूल रास न आए, तो पुराना ठिकाना सुरक्षित है।
राज्य के प्राथमिक, माध्यमिक और उच्च माध्यमिक विद्यालयों में वर्षों से गृह जिले या अनुकूल पदस्थापन की राह देख रहे पौने दो लाख से अधिक शिक्षकों के लिए यह एक अप्रत्याशित राहत है।
हाईकोर्ट की सख्ती और सरप्लस विवाद ने बदली विभाग की रणनीति
शिक्षा विभाग को नियमों की समीक्षा की मेज पर यूं ही नहीं लौटना पड़ा। इसके पीछे नीतिगत खामियों और अदालती दखल की एक लंबी श्रृंखला है।
शिक्षा विभाग की पूर्व नीति के तहत जिन विद्यालयों में छात्र-शिक्षक अनुपात के आधार पर शिक्षकों की संख्या अधिक पाई गई, वहां पांच साल से अधिक समय से जमे वरीय (सीनियर) शिक्षकों को सीधे ‘सरप्लस’ (अधिशेष) घोषित कर दिया गया था। इस व्यवस्था का तीखा विरोध हुआ। दशकों से सुदूर ग्रामीण इलाकों में सेवा दे रहे अनुभवी शिक्षकों का तर्क था कि वरीयता को सजा का आधार नहीं बनाया जा सकता।
मामला पटना उच्च न्यायालय की चौखट तक पहुंच गया। न्यायालय में कानूनी पेंच फंसते ही न केवल सामान्य तबादलों की पूरी प्रक्रिया थम गई, बल्कि विभाग के सामने प्रशासनिक गतिरोध भी खड़ा हो गया।
अदालती रुख और शिक्षक संगठनों के आक्रोश को भांपते हुए विभाग ने नीति को लचीला बनाने की कवायद तेज की। इसी समीक्षा का नतीजा है कि अब पांच साल वाली सेवा शर्त को पूरी तरह से विलोपित करने की तैयारी है।
सीनियर शिक्षकों को सरप्लस की तलवार से बचाते हुए अब कनिष्ठ (जूनियर) संवर्ग को आवश्यकतानुसार अधिशेष श्रेणी में चिह्नित करने का नया फॉर्मूला तैयार किया जा रहा है।
एचटी और एचएम के साथ सामूहिक आवेदन का मिलेगा अवसर
विभाग केवल सामान्य शिक्षकों तक ही इस बदलाव को सीमित नहीं रख रहा है। व्यवस्थागत संतुलन बनाए रखने के लिए प्रधान शिक्षकों (Head Teachers) और प्रधानाध्यापकों (Headmasters) को भी इस दायरे में शामिल किया गया है।
”स्वैच्छिक तबादले में नये स्कूल ज्वाइनिंग की बाध्यता नहीं है। सरप्लस शिक्षकों को पुनः अपनी पसंद दर्ज करने का मौका दिया जाएगा।”
— मिथिलेश तिवारी, शिक्षा मंत्री, बिहार
प्रस्तावित नियमों के तहत अब सहायक शिक्षक, प्रधान शिक्षक और प्रधानाध्यापक एक साथ स्थानांतरण के लिए आवेदन कर सकेंगे। इससे पहले प्रशासनिक पदों पर आसीन शिक्षकों के तबादले को लेकर अस्पष्टता की स्थिति बनी हुई थी, जिससे कई स्कूलों में प्रशासनिक रिक्तता का अंदेशा गहरा गया था।
साथ ही, जिन शिक्षकों के पारस्परिक स्थानांतरण (Mutual Transfer) के आवेदन सरप्लस विवाद या तकनीकी खामियों के चलते निरस्त या लंबित हो गए थे, उन्हें ई-शिक्षाकोष पोर्टल पर दोबारा आवेदन का अवसर दिया जाएगा।
पुरानी नियमावली बनाम प्रस्तावित नीति: क्या बदलेगा?
प्रस्तावित बदलाव शिक्षकों की चिंताओं को कितना दूर करेंगे, इसे नीचे दिए गए तुलनात्मक ढांचे से समझा जा सकता है:
| नीतिगत आयाम | पुरानी व्यवस्था / पूर्व प्रावधान | प्रस्तावित नया संशोधन |
|---|---|---|
| तबादले के बाद ज्वाइनिंग | स्थानांतरण आदेश जारी होने पर नए विद्यालय में योगदान अनिवार्य। | स्वैच्छिक तबादले में नई ज्वाइनिंग की कोई बाध्यता नहीं; पुराने स्कूल में बने रहने की छूट। |
| सरप्लस निर्धारण का आधार | 5 वर्ष या उससे अधिक सेवा वाले सीनियर शिक्षकों को पहले सरप्लस मानना। | 5 वर्ष की सेवा शर्त समाप्त; मुख्य रूप से कनिष्ठ (जूनियर) शिक्षकों को सरप्लस श्रेणी में रखना। |
| पसंदीदा स्कूल का चयन | सीमित विकल्प; विसंगति होने पर सीधे दूरदराज समायोजन। | शिक्षकों को पोर्टल पर पुनः अपनी पसंद के रिक्त विद्यालयों का विकल्प चुनने का अवसर। |
| प्रशासनिक पदों का तबादला | शिक्षकों और एचएम/एचटी के लिए अलग-थलग व अस्पष्ट प्रक्रिया। | शिक्षक, हेड टीचर (HT) और हेडमास्टर (HM) को एक साथ आवेदन की सुविधा। |
| म्यूचुअल ट्रांसफर की स्थिति | सरप्लस घोषित होने पर म्यूचुअल ट्रांसफर के आवेदन खारिज होने का संकट। | पारस्परिक स्थानांतरण के लिए पोर्टल पर दोबारा स्पष्ट विंडो दी जाएगी। |
| समायोजन न होने का परिणाम | मनमाने स्तर पर दूरदराज पदस्थापना का अंदेशा। | पसंदीदा विकल्प न मिलने पर अंतिम विकल्प के तौर पर राज्य स्तर पर रैंडम पोस्टिंग। |
पसंद के स्कूल चुनने की नई विंडो: रैंडम पोस्टिंग का पेंच अभी बाकी
योजना के मुताबिक विभाग जल्द ही ई-शिक्षाकोष पोर्टल पर रिक्त पदों की अद्यतन सूची के साथ चॉइस-फिलिंग का लिंक फिर से खोलेगा।
शिक्षक अपने विषय, संवर्ग और उपलब्ध सीटों के आधार पर पसंदीदा स्कूलों की प्राथमिकता सूची भर सकेंगे। लेकिन राहत के इस पैकेज के साथ एक कड़ा पेंच भी नत्थी है।
यदि कोई शिक्षक सरप्लस की श्रेणी में आता है और विभाग द्वारा दिए गए विकल्पों के बावजूद उसका समायोजन संबंधित जिले या चयनित प्रखंड के स्कूलों में नहीं हो पाता है, तो विभाग के पास प्रशासनिक अधिकार सुरक्षित रहेगा। ऐसी दशा में उस शिक्षक को राज्य के किसी भी सरकारी विद्यालय में कंप्यूटर आधारित लॉटरी या रैंडम (Random) तरीके से पदस्थापित किया जा सकता है।
शिक्षा विभाग के अधिकारियों का मानना है कि रैंडम पदस्थापन की संभावना को न्यूनतम रखने के लिए ही विकल्पों का दायरा बढ़ाया जा रहा है। सरकार की कोशिश है कि अधिकांश शिक्षकों को उनके गृह अनुमंडल, गृह जिले या सीमावर्ती प्रखंडों में ही समायोजित कर लिया जाए, ताकि महिला और दिव्यांग शिक्षकों को गैर-जरूरी परिवहन संकट न झेलना पड़े।
जमीनी हकीकत: महिला शिक्षिकाओं और गृह जिले की आस
बिहार में बीपीएससी टीआरई (BPSC TRE) और सक्षमता परीक्षा पास विशिष्ट शिक्षकों की एक बड़ी तादाद अपने गृह जिले से 100 से 200 किलोमीटर दूर पदस्थापित है।
विशेष रूप से महिला शिक्षिकाएं, गंभीर बीमारियों से ग्रसित शिक्षक और वृद्ध माता-पिता पर आश्रित शिक्षक लंबे समय से गृह जिले में पदस्थापना की मांग उठा रहे थे। ऐसे में यदि किसी शिक्षक को स्वैच्छिक आवेदन के बाद मनपसंद स्कूल न मिलकर और अधिक बीहड़ या प्रतिकूल क्षेत्र का स्कूल आवंटित हो जाता, तो पुरानी व्यवस्था में उसके सामने नौकरी छोड़ने या मानसिक प्रताड़ना झेलने के सिवा चारा नहीं बचता था।
ज्वाइनिंग की बाध्यता खत्म करने का निर्णय इसी व्यावहारिक मानवीय संकट की काट है। अगर नया स्कूल घर से और दूर निकला, तो शिक्षक आदेश को अस्वीकार कर अपनी वर्तमान कुर्सी पर डटे रह सकते हैं।
हालांकि, शिक्षक संघों की नजर अब भी आधिकारिक संकल्प और विभागीय अधिसूचना की भाषा पर टिकी है। उनका कहना है कि जब तक विभागीय अधिसूचना स्पष्ट दिशा-निर्देशों के साथ जारी नहीं हो जाती, तब तक क्षेत्रीय शिक्षा उपनिदेशक (RDE) और जिला शिक्षा पदाधिकारी (DEO) स्तर पर व्याख्याओं का अंतर शिक्षकों को उलझाए रख सकता है।
शिक्षा मंत्री के आश्वासन ने विवाद की आग पर पानी तो डाला है, लेकिन गेंद अब शिक्षा विभाग के तकनीकी प्रकोष्ठ और नीति नियामकों के पाले में है कि वे बिना किसी तकनीकी पेंच के इस व्यवस्था को धरातल पर कैसे उतारते हैं।


