auto_awesome एक नज़र में (Major Highlights)
◾️बिहार शिक्षा विभाग ने शहरी क्षेत्रों के लगभग 4,000 सरप्लस शिक्षकों का ग्रामीण और दूरदराज के स्कूलों में स्थानांतरण (transfer) करने का निर्णय लिया है।
◾️राज्य के 20 हजार से अधिक स्कूलों में गणित के शिक्षक नहीं हैं, जबकि शहरों में हिंदी और समाजशास्त्र के शिक्षक सरप्लस हैं।
◾️60 छात्रों पर 2 शिक्षकों के मानक से शिक्षकों की कमी तो एडजस्ट होगी, लेकिन एक ही कमरे में 5 कक्षाओं की पढ़ाई (मल्टीग्रेड शिक्षण) से शुरुआती शिक्षा की गुणवत्ता पर भारी दबाव पड़ेगा।
◾️बिहार सरकार अगले 5 वर्षों में 1 लाख नए शिक्षकों की भर्ती करेगी, जिससे कुल संख्या 7 लाख हो जाएगी।

20 हजार स्कूलों में गणित के शिक्षक नहीं हैं, शिक्षा विभाग 60 छात्रों पर 2 शिक्षकों के मानक के तहत बड़ा फेरबदल करने जा रहा है।
बिहार के लगभग हर जिले के शहरी क्षेत्रों में करीब चार हजार शिक्षक सरप्लस (Surplus Teachers) की स्थिति में हैं। दूसरी तरफ एक चौंकाने वाला जमीनी सच भी है। राज्य के 20 हजार से अधिक सरकारी स्कूलों में गणित पढ़ाने के लिए एक भी शिक्षक मौजूद नहीं है।
शिक्षा विभाग (Education Department) अब इस भारी असंतुलन को दूर करने के लिए कड़े कदम उठाने जा रहा है। पटना, बेगूसराय, भागलपुर, गया, मुजफ्फरपुर और वैशाली के सुगम शहरी स्कूलों में मौजूद इन अतिरिक्त शिक्षकों का ट्रांसफर अब सीधे ग्रामीण और दूरदराज के इलाकों में किया जाएगा।
60 छात्रों पर 2 शिक्षक: मल्टीग्रेड शिक्षण का खतरा
विभाग द्वारा तय किए गए नए मानकों के अनुसार, अब 60 छात्रों पर दो शिक्षकों की नियुक्ति अनिवार्य होगी। नियम यह भी है कि जो शिक्षक एक ही स्कूल में 5 साल से अधिक समय से कार्यरत हैं, उन्हें भी सरप्लस श्रेणी में डाल दिया गया है।
इस फॉर्मूले से ग्रामीण इलाकों में शिक्षकों की कमी तो दूर होगी, लेकिन यह एक नई समस्या को भी जन्म दे सकता है। यदि किसी विद्यालय में केवल 60 छात्र हैं, तो वही दो शिक्षक कक्षा 1 से 5 तक की पूरी पढ़ाई संभालेंगे।
इससे मल्टीग्रेड शिक्षण (Multigrade Teaching) की स्थिति बनेगी, जहां एक ही कमरे में अलग-अलग कक्षाओं के बच्चे बैठेंगे। स्कूलों में भवनों की कमी पहले से ही एक बड़ी चुनौती है, और ऐसे में बच्चों की सीखने की क्षमता पर सीधा नकारात्मक असर पड़ सकता है। जानकारों का मानना है कि प्रत्येक प्राथमिक विद्यालय में प्रधान शिक्षक सहित कम से कम 5 शिक्षक होने चाहिए।
इस बदलाव पर चिंता जताते हुए बिहार राज्य प्राथमिक शिक्षक संघ के सचिव आनंद मिश्रा का कहना है कि विषयवार और क्षेत्रवार संतुलित तैनाती शिक्षा विभाग के लिए सबसे बड़ी प्रशासनिक चुनौती होगी।
हिंदी-इतिहास के शिक्षक ज्यादा, विज्ञान-गणित में भारी कमी
विषयवार शिक्षकों का असंतुलन विभाग के लिए सिरदर्द बना हुआ है। सरकारी स्कूलों में हिंदी, समाजशास्त्र, इतिहास और कला विषयों के शिक्षकों की संख्या जरूरत से बहुत अधिक है।
इसके विपरीत गणित, विज्ञान और कॉमर्स के शिक्षकों का भारी टोटा है। हालात इतने विकट हैं कि गणित जैसे महत्वपूर्ण विषय को स्कूलों में अंग्रेजी या समाजशास्त्र के शिक्षक पढ़ा रहे हैं। भौतिकी (Physics) और रसायन विज्ञान (Chemistry) में भी शिक्षकों की कमी बनी हुई है। हालांकि, जीवविज्ञान (Biology) के शिक्षकों की स्थिति अन्य विज्ञान विषयों की तुलना में थोड़ी बेहतर आंकी गई है।
शिक्षा मंत्री का स्पष्ट रुख और आगे की योजना
इस पूरी समायोजन नीति पर शिक्षा मंत्री मिथिलेश तिवारी का रुख एकदम स्पष्ट है।
उन्होंने कहा: “शिक्षा विभाग का उद्देश्य सभी छात्रों को शिक्षित करना है। ऐसे में शहरी और ग्रामीण क्षेत्रों के सभी स्कूलों में मानक के अनुसार शिक्षकों की नियुक्ति की जाएगी।”
मंत्री ने आगे आश्वासन दिया कि प्रत्येक विषय के लिए शिक्षक उपलब्ध कराए जाएंगे और जिन स्कूलों में शिक्षकों की संख्या अधिक है, वहां से उन्हें अनिवार्य रूप से दूसरे स्कूलों में भेजा जाएगा।
आंकड़ों की बात करें तो वर्तमान में बिहार में 78,000 स्कूलों के लिए 5.88 लाख शिक्षक हैं। (तुलनात्मक रूप से यूपी में 1.5 लाख स्कूलों पर 6.27 लाख, एमपी में 92,250 स्कूलों पर 3.99 लाख, और पश्चिम बंगाल में 82,000 स्कूलों पर 4.48 लाख शिक्षक हैं)।
राज्य सरकार की योजना है कि अगले 5 वर्षों में 1 लाख अतिरिक्त शिक्षकों की भर्ती की जाए। इसके बाद बिहार में कुल शिक्षकों की संख्या करीब 7 लाख तक पहुंच जाएगी।