​बिहार में बड़ा एजुकेशन क्राइसिस: रोजगार के फेर में छूटा 33,430 बच्चों का स्कूल, मुजफ्फरपुर टॉप पर!

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auto_awesome एक नज़र में (Major Highlights)

▪️डोर-टू-डोर सर्वे में बिहार में 33,430 ड्रॉपआउट बच्चे मिले। अब 30 दिन की लगातार अनुपस्थिति पर 'प्रबंध पोर्टल' के जरिए सख्त ट्रैकिंग होगी।
▪️यह डेटा 2025-26 के सर्वे का है, जो पूरे बिहार का है (मुजफ्फरपुर और पटना सबसे अधिक प्रभावित)।
▪️रोजगार के लिए परिवारों के पलायन से बच्चों की पढ़ाई छूट रही है। सरकार को इन बच्चों की वापसी के लिए 6 से 9 महीने का विशेष प्रशिक्षण चलाना पड़ रहा है।
▪️22,000 से अधिक वापस लौटे बच्चों को ट्रेनिंग दी जा रही है। शहरी इलाकों में घुमंतू बच्चों के नामांकन के लिए पुलिस की मदद ली जा रही है।

बिहार शिक्षा परियोजना परिषद के सर्वे में बड़ा खुलासा। रोजगार के लिए पलायन के कारण बिहार में 33,430 बच्चे स्कूल से ड्रॉपआउट। मुजफ्फरपुर और पटना में सबसे खराब स्थिति। पूरी रिपोर्ट पढ़ें।

शिक्षा परियोजना परिषद के महा-सर्वेक्षण में चौंकाने वाले आंकड़े; स्कूल वापसी के लिए 30 दिन की अनुपस्थिति पर अब होगी विशेष ट्रैकिंग।

​33 हजार 430. यह महज एक संख्या नहीं है, बल्कि बिहार के उन बच्चों का आंकड़ा है जिनकी पढ़ाई, परिवारों के रोजगार की तलाश में हुए पलायन की भेंट चढ़ गई। वर्ष 2025-26 के लिए ‘बिहार शिक्षा परियोजना परिषद’ द्वारा कराए गए एक वृहद घर-घर सर्वे में यह चिंताजनक बात सामने आई है कि राज्य में इतनी बड़ी संख्या में बच्चे स्कूल से ड्रॉपआउट हो चुके हैं। अकेले भागलपुर जिले में यह आंकड़ा 357 दर्ज किया गया है।

​शिक्षा विभाग अब डैमेज कंट्रोल मोड में है। नए और सख्त नियमों के अनुसार, नामांकन के बाद यदि कोई बच्चा लगातार 30 कार्यदिवसों तक बिना सूचना अनुपस्थित रहता है, तो उसे तत्काल ड्रॉपआउट मान लिया जाएगा। इन बच्चों को वापस शिक्षा की मुख्यधारा से जोड़ने के लिए ‘प्रबंध पोर्टल’ (Prabandh Portal) पर उनकी विशेष ट्रैकिंग शुरू कर दी गई है।

​सर्वेक्षण के आंकड़े बताते हैं कि पलायन का सर्वाधिक दंश कुछ विशेष जिलों ने झेला है। सर्वाधिक स्कूल छोड़ने वाले बच्चों में मुजफ्फरपुर (5,591) शीर्ष पर है, जिसके बाद राजधानी पटना (2,399), सीतामढ़ी (2,195), शिवहर (2,020) और कटिहार (1,733) का नंबर आता है।

​दूसरी तरफ, कुछ जिलों ने बेहतर प्रबंधन का उदाहरण भी पेश किया है। अरवल जिले में ड्रॉपआउट की संख्या पूरे राज्य में सबसे कम (महज़ 98) रही। इसके अलावा मधेपुरा (149), सारण (154), कैमूर-भभुआ (187) और सीवान (254) न्यूनतम ड्रॉपआउट वाले शीर्ष पांच जिलों में शामिल हैं।

​हेल्प-डेस्क और महा-सर्वेक्षण की ग्राउंड रिपोर्ट

​आंकड़े जुटाने की यह कवायद केवल कागजों तक सीमित नहीं थी। इस महा-सर्वेक्षण को सफल बनाने के लिए प्रत्येक विद्यालय में बाकायदा एक हेल्प-डेस्क का गठन किया गया। मतदाता सूची को आधार बनाकर शिक्षकों, टोला सेवकों और आंगनबाड़ी सेविकाओं की टीम ने घर-घर जाकर यह डेटा संकलित किया। शहरी क्षेत्रों में रेलवे स्टेशन, मंदिरों और चौराहों के आसपास रहने वाले घुमंतू बच्चों को भी शिक्षा के दायरे में लाने के लिए पुलिस और स्थानीय निकायों का सहयोग लिया गया।

​इस भारी भरकम ट्रैकिंग के बाद विभाग ने वापसी का विशेष अभियान भी छेड़ा है। अब तक 6,211 बच्चों का सीधे स्कूलों में दोबारा नामांकन कराया जा चुका है। जो बच्चे लंबे अंतराल के बाद वापस लौटे हैं, उनमें से 18,898 छात्रों को 6 महीने और 3,715 छात्रों को 9 महीने का विशेष प्रशिक्षण (Special Training) दिया जा रहा है। इसके अतिरिक्त, 4,606 बच्चों की पढ़ाई दोबारा शुरू कराने के लिए उन्हें ‘बिहार बोर्ड ऑफ ओपन स्कूलिंग एंड एग्जामिनेशन’ (BBOSE) से जोड़ा गया है।

​भागलपुर की स्थिति पर बात करते हुए जिला कार्यक्रम पदाधिकारी शशि चंदन ने कहा, “भागलपुर में 357 आउट ऑफ स्कूल बच्चों की पहचान हुई है, जिनमें से 58 का दोबारा विद्यालयों में नामांकन कराया जा चुका है।” उन्होंने यह भी स्पष्ट किया कि नियमित मॉनिटरिंग, स्कूलों की सतत निगरानी और शिक्षकों व टोला सेवकों के समन्वित प्रयासों से ही जिले में ड्रॉपआउट की संख्या अपेक्षाकृत कम रखने में मदद मिली है।

Prabhanjan

verifiedHead Teacher and Educational Content Writer

Expertise: MA, D.El.Ed

Head Teacher in Primary School Bihar

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