auto_awesome एक नज़र में (Major Highlights)
▪️भारतीय रिजर्व बैंक (RBI) देश में कागजी नोटों की जगह मजबूत और सुरक्षित प्लास्टिक (पॉलीमर) नोट लाने के फायदे और नुकसान का अध्ययन कर रहा है।
▪️वित्त वर्ष 2024-25 में कागजी नोटों की छपाई पर ₹6,372.8 करोड़ का खर्च आया है और 23.8 अरब खराब नोट नष्ट किए गए हैं।
▪️पॉलीमर नोट पानी और पसीने से नहीं गलते, जिससे जाली नोटों का धंधा रुकेगा और सरकार के छपाई व रिप्लेसमेंट खर्च में भारी बचत होगी।
▪️RBI वर्तमान में इसके तकनीकी पहलुओं की जांच कर रहा है; हालांकि, अभी तक कोई अंतिम निर्णय नहीं लिया गया है।

कागजी नोटों की भारी छपाई लागत और उनके जल्दी खराब होने की समस्या से निपटने के लिए आरबीआई ने पॉलीमर नोटों के विकल्प पर फिर से अध्ययन शुरू कर दिया है।
₹6,372.8 करोड़। यह वह भारी-भरकम रकम है जो वित्त वर्ष 2024-25 में भारत ने केवल कागजी नोटों की छपाई पर खर्च की है। इसके साथ ही, इसी दौरान 23.8 अरब खराब हो चुके नोटों को नष्ट भी करना पड़ा। इन लगातार बढ़ते खर्चों और नोटों की कम उम्र को देखते हुए, भारतीय रिजर्व बैंक (RBI) अब भविष्य की जरूरतों के लिए ‘प्लास्टिक मनी’ (Polymer Notes) की तरफ रुख करने पर गंभीरता से विचार कर रहा है।
प्लास्टिक मनी का विचार भारत के लिए नया नहीं है; इस पर पिछले 17 सालों (2009 से) से मंथन चल रहा है। साल 2012 में कोच्चि, जयपुर, भुवनेश्वर और शिमला में 10 रुपये के प्लास्टिक नोटों के परीक्षण की बात उठी थी, लेकिन योजना धरातल पर उतरने से पहले ही अटक गई।
”RBI भारत में प्लास्टिक यानी पॉलीमर के नोट चलाने के विचार पर काम कर रहा है,” वर्तमान RBI गवर्नर संजय मल्होत्रा ने इस पहल की पुष्टि करते हुए बताया। हालांकि, उन्होंने तुरंत यह भी स्पष्ट किया कि बैंक अभी हर फायदे और नुकसान की अच्छे से जांच कर रहा है, और इस योजना पर कोई आखिरी फैसला नहीं लिया गया है।
2014 का ट्रायल: पहले क्यों फेल हुए थे प्लास्टिक नोट?
साल 2014 के आसपास सरकार ने देश के पांच शहरों—जयपुर, शिमला, भुवनेश्वर, मैसूर और कोच्चि—में 10 रुपये के प्लास्टिक नोटों का एक छोटा ट्रायल (टेस्ट) किया था। लेकिन जमीनी हकीकत पर यह तरीका सफल नहीं हो पाया।
इसकी सबसे बड़ी वजह तकनीकी थी। उस समय देश के ATM और बैंकों की नोट गिनने वाली मशीनें केवल कागजी नोटों की बनावट के हिसाब से बनी थीं। प्लास्टिक के नोटों की वजह से मशीनें बार-बार जाम होने लगीं। इसके अलावा, भारत की तेज गर्मी में इन नोटों के आपस में चिपकने और सिकुड़ने का डर भी एक बड़ा कारण बना, जिसके बाद इस काम को रोक दिया गया। अब RBI इन पुरानी कमियों को दूर करने की तैयारी कर रहा है।
Polymer Notes के 4 बड़े फायदे
बाइएक्सियली ओरिएंटेड पॉलीप्रोपाईलिन (BOPP) नामक विशेष प्लास्टिक से बने ये नोट साधारण कागजी नोटों की तुलना में 5 से 7 गुना अधिक मजबूत होते हैं।
इनका सबसे बड़ा फायदा इनकी मजबूती है। ये नोट पानी या पसीने से गलते नहीं हैं और आसानी से फटते भी नहीं हैं। धूल और मिट्टी का इन पर कोई असर नहीं होता, जिससे ये गंदे और काले नहीं पड़ते।
सुरक्षा के लिहाज से, इन पर ऐसे विशेष सिक्योरिटी फीचर्स (Security Features) लगाए जा सकते हैं जिनकी नकल करना लगभग नामुमकिन होता है। इससे देश में नकली नोटों का धंधा पूरी तरह बंद हो जाएगा। हालांकि इन्हें छापने का शुरुआती खर्च ज्यादा होता है, लेकिन लंबे समय तक चलने के कारण बार-बार नए नोट छापने का सरकारी खर्च काफी बच जाता है। आंकड़ों के अनुसार, 2025-26 में भी नोटों की छपाई पर 4,875 करोड़ रुपये का खर्च दर्ज किया गया है, जिसे पॉलीमर नोटों से नियंत्रित किया जा सकता है।
Digital Transactions के दौर में कैश की क्या जरूरत?
जब UPI और डिजिटल ट्रांजेक्शन इतना व्यापक हो चुका है, तो प्लास्टिक नोटों पर इतना ध्यान क्यों दिया जाए?
यह तर्क सुनने में अच्छा लगता है, लेकिन जमीनी सच्चाई इससे काफी कटी हुई है।
आज भी भारत के सात लाख से अधिक गांवों में निर्बाध इंटरनेट उपलब्ध नहीं है। असंगठित क्षेत्र के करोड़ों लोगों—वृद्धजनों, दिहाड़ी मजदूरों, और रेहड़ी-पटरी वालों—के लिए नकद मुद्रा ही जीवन का आधार है। जब बिजली जाती है, सर्वर डाउन होते हैं, या मोबाइल चार्ज नहीं होता, तब भी केवल कैश ही काम करता है।
वर्तमान में, भारत में कागज के नोट चार सरकारी प्रिंटिंग प्रेस—देवास (मध्य प्रदेश), नासिक (महाराष्ट्र), मैसूर (कर्नाटक) और सालबोनी (पश्चिम बंगाल)—में छपते हैं। इन्हें बनाने के लिए विशेष प्रकार के कॉटन के कागज और उच्च-सुरक्षा वाली स्याही (इंटैग्लियो) का उपयोग किया जाता है। अब यह देखना दिलचस्प होगा कि ऑस्ट्रेलिया (जिसने 1988 में पहली बार इसे बड़े स्तर पर अपनाया था), ब्रिटेन, सिंगापुर और वियतनाम सहित दुनिया के 60 देशों की तरह, भारत कब तक पूरी तरह से ‘प्लास्टिक मनी’ को अपनाता।