​बिहार के 76 हजार स्कूलों को ₹372 करोड़ जारी, छोटी मरम्मत के लिए दफ्तरों के चक्कर बंद

updateUpdated: November 7, 2026 at 5:43 pm schedule 8 min read
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auto_awesome एक नज़र में (Major Highlights)

◾️बिहार सरकार ने राज्य के 76,000 से अधिक सरकारी स्कूलों में बुनियादी सुविधाओं और मरम्मत कार्यों के लिए ₹372 करोड़ की कंपोजिट ग्रांट जारी की है।
◾️कुल ₹372.24 करोड़ स्वीकृत; 66,799 प्रारंभिक स्कूलों को ₹305.43 करोड़ तथा 9,312 उच्च माध्यमिक स्कूलों को ₹66.81 करोड़ का प्रत्यक्ष आवंटन।
◾️स्कूलों को अब चापाकल, शौचालय या भवन मरम्मत जैसी छोटी जरूरतों के लिए विभागीय मुख्यालय की अनुमति और बजट के लिए महीनों इंतजार नहीं करना पड़ेगा।
◾️विद्यालय प्रबंधन समितियां अपनी स्थानीय प्राथमिकताओं के आधार पर समय-सीमा के भीतर कार्य पूरा करेंगी और कायाकल्प पोर्टल पर विवरण दर्ज करेंगी।

​शिक्षा विभाग ने ‘सेवा संकल्प एवं कायाकल्प अभियान’ के तहत दी वित्तीय स्वायत्तता, अब स्थानीय प्राथमिकताओं से सुधरेंगे विद्यालय।

​कल तक बिहार के किसी प्राथमिक या मध्य विद्यालय में यदि चापाकल का एक वाशर खराब हो जाता या शौचालय की कुंडी टूट जाती, तो प्रधानाध्यापक को ब्लॉक से लेकर जिला मुख्यालय तक के चक्कर काटने पड़ते थे। महीनों तक फाइलें एक टेबल से दूसरी टेबल पर सरकती थीं, प्रस्ताव स्वीकृत होने का इंतजार होता था और इस दौरान छात्र टूटी कक्षाओं या बिना पानी के परिसरों में पढ़ने को मजबूर रहते थे।

​अब यह पूरी व्यवस्था उलट दी गई है।

​राज्य सरकार ने शिक्षा विभाग के मुख्यालय की पूर्वानुमति और जटिल प्रशासनिक प्रक्रियाओं की बाध्यता को समाप्त करते हुए बिहार के 76 हजार से अधिक सरकारी विद्यालयों के लिए ₹372 करोड़ की कंपोजिट ग्रांट (Composite School Grant) मंजूर कर जारी कर दी है। इस फैसले के बाद अब स्कूल प्रबंधन को परिसर की छोटी-मोटी मरम्मत, रंग-रोगन या बुनियादी सुविधाओं को दुरुस्त करने के लिए अधिकारियों के आगे हाथ फैलाने की जरूरत नहीं होगी।

​पैसा सीधे स्कूलों के खाते में पहुंचेगा, और खर्च का फैसला भी स्कूल की अपनी चारदीवारी के भीतर होगा।

​’सेवा संकल्प एवं कायाकल्प अभियान’: क्या है नई नीति की रूपरेखा?

​शिक्षा विभाग के अनुसार, यह पूरी कवायद राज्य सरकार के महत्वाकांक्षी ‘सेवा संकल्प एवं कायाकल्प अभियान’ के तहत संचालित की जा रही है। इस अभियान का मुख्य उद्देश्य विद्यालयों की पूर्व से उपलब्ध आधारभूत संरचनाओं का उन्नयन, सुदृढ़ीकरण और समयबद्ध रखरखाव सुनिश्चित करना है।

​अधिकारियों का मानना है कि स्कूल भवनों का बड़ा हिस्सा सिर्फ इसलिए जर्जर हो जाता था क्योंकि समय पर छोटी दरारों, टपकती छतों या उखड़ते प्लास्टर की मरम्मत नहीं हो पाती थी। वित्तीय अभाव और प्रशासनिक लालफीताशाही के कारण मामूली सी खराबी कुछ ही वर्षों में गंभीर संरचनात्मक संकट बन जाती थी। कंपोजिट ग्रांट के माध्यम से सरकार ने इसी जड़ पर प्रहार किया है। अब स्कूलों के पास नियमित रखरखाव के लिए एक सुनिश्चित बजट उपलब्ध रहेगा, जिसे वे बिना किसी अतिरिक्त अनुमोदन के आवश्यकतानुसार खर्च कर सकेंगे।

​बजट का गणित: किस स्तर के स्कूल को कितना आवंटन?

​समग्र शिक्षा अभियान (Samagra Shiksha) और यू-डायस (U-DISE) के अद्यतन छात्र नामांकन आंकड़ों के आधार पर इस राशि का विभाजन किया गया है। राज्य के प्रारंभिक स्तर के स्कूलों से लेकर उच्च माध्यमिक विद्यालयों तक को इस वित्तीय सहायता के दायरे में लाया गया है।

​स्वीकृत ₹372 करोड़ में से बड़ा हिस्सा ग्रामीण और कस्बाई क्षेत्रों में स्थित प्रारंभिक विद्यालयों को आवंटित किया गया है, जहां संसाधनों की कमी सबसे अधिक महसूस की जाती रही है।

​विद्यालय श्रेणी एवं स्वीकृत राशि का विवरण

विद्यालय की श्रेणीआच्छादित स्कूलों की संख्याकुल स्वीकृत राशि (करोड़ रुपये में)प्राथमिक कार्य क्षेत्र
प्रारंभिक विद्यालय (वर्ग 1 से 8 तक)66,799₹305.43 करोड़पेयजल, शौचालय, रंग-रोगन, ब्लैकबोर्ड, टाइल्स व वर्ग-कक्ष रखरखाव
उच्च माध्यमिक विद्यालय (वर्ग 9 से 12 तक)9,312₹66.81 करोड़प्रयोगशालाएं, विद्युत व्यवस्था, स्वच्छता परिसर व शिक्षण सामग्री
कुल योग76,111+ विद्यालय₹372.24 करोड़ (~₹372 करोड़)संपूर्ण राज्य में त्वरित आधारभूत सुधार

इस वर्गीकरण से स्पष्ट है कि प्राथमिक और मध्य विद्यालयों के 66 हजार से अधिक भवनों की दशा सुधारने पर सरकार का विशेष फोकस है, जहां राज्य के करोड़ों बच्चे अपनी स्कूली शिक्षा की शुरुआत करते हैं।

​जरूरत से तय होगी काम की प्राथमिकता: एकरूपता का नियम खत्म

​इस नई व्यवस्था की सबसे बड़ी खासियत इसका लचीलापन (Flexibility) है। पूर्ववर्ती व्यवस्थाओं में अक्सर मुख्यालय से एक सांचा तैयार कर दिया जाता था कि सभी स्कूलों को एक निश्चित मद में ही पैसा खर्च करना है। इसका दुष्परिणाम यह होता था कि जिस स्कूल को बाउंड्री वॉल या छत की मरम्मत की जरूरत होती थी, उसे बेंच-डेस्क खरीदने का फरमान मिल जाता था।

​अब इसे पूरी तरह बदल दिया गया है।

​”जरूरत से तय होगी काम की प्राथमिकता” के सिद्धांत के तहत:

  • ​पेयजल संकट वाले स्कूल: जहां चापाकल खराब हैं, सबमर्सिबल पंप की मोटर जली है या पाइपलाइन टूटी है, वहां का विद्यालय प्रबंधन सबसे पहले जलापूर्ति बहाल करने पर राशि व्यय करेगा।
  • ​स्वच्छता प्राथमिकता: जिन विद्यालयों में बालकों या बालिकाओं के शौचालय बदहाल हैं, दरवाजे टूटे हैं या सेप्टिक टैंक की सफाई लंबित है, वहां पहली प्राथमिकता स्वच्छता ढांचे को दी जाएगी।
  • ​भवन व कक्षा-कक्ष संरक्षण: बरसात के कारण प्लास्टर उखड़ने, दीवारों में सीलन या खिड़कियों के शीशे टूटने की स्थिति में तुरंत स्थानीय स्तर पर राजमिस्त्री और कारीगर लगाकर काम पूरा कराया जा सकेगा।
  • ​आवर्ती शिक्षण व्यय (Recurring Expenses): दैनिक शैक्षणिक गतिविधियों के सुचारु संचालन के लिए चाक, डस्टर, रजिस्टर, प्रिंटिंग और प्राथमिक उपचार (First Aid) किट जैसी अनिवार्य वस्तुओं पर भी इस मद से खर्च अनुमन्य होगा।

​सीधे शब्दों में कहें तो स्कूल की बीमारी जो होगी, दवा भी उसी हिसाब से खरीदी जाएगी।

​जिलावार आवंटन: बड़े जिलों को मिला बड़ा हिस्सा

​भौगोलिक विस्तार और विद्यालयों की संख्या के अनुपात में जिलों को कंपोजिट ग्रांट जारी की गई है। आधिकारिक आंकड़ों के अनुसार, दक्षिणी और उत्तरी बिहार के सघन छात्र आबादी वाले जिलों को सर्वाधिक धनराशि प्राप्त हुई है।

​गया जिला प्राथमिक स्तर पर फंड आवंटन में सबसे आगे रहा है, जहां 3,067 प्राथमिक व मध्य विद्यालयों के लिए ₹13.48 करोड़ की राशि निर्धारित की गई है। इसके ठीक बाद पूर्वी चंपारण को ₹14.99 करोड़ तथा मुजफ्फरपुर को ₹14.19 करोड़ की भारी राशि मिली है।

​प्रमुख जिलों में कंपोजिट ग्रांट का वितरण

जिलाप्राथमिक विद्यालयों की संख्यास्वीकृत राशि (प्राथमिक स्तर)माध्यमिक/उच्च माध्यमिक आवंटन
पूर्वी चंपारण3,300+₹14.99 करोड़जिले के उच्च विद्यालयों हेतु पृथक प्रावधान
मुजफ्फरपुर3,100+₹14.19 करोड़उच्च माध्यमिक विद्यालयों हेतु पृथक प्रावधान
गया3,067₹13.48 करोड़माध्यमिक विद्यालयों हेतु संयुक्त आवंटन
नालंदा2,157₹8.45 करोड़283 माध्यमिक विद्यालयों हेतु ₹2.01 करोड़
शेखपुरा474₹2.25 करोड़लघु जिला आवंटन सूची में सम्मिलित
शिवहर375₹2.01 करोड़न्यूनतम विद्यालय संख्या के अनुरूप बजट

छोटे जिलों जैसे शेखपुरा (474 स्कूल) और शिवहर (375 स्कूल) को उनकी संख्या के आधार पर क्रमशः ₹2.25 करोड़ और ₹2.01 करोड़ मिले हैं। इससे स्पष्ट है कि किसी भी जिले के किसी भी कोने में स्थित स्कूल को वंचित नहीं छोड़ा गया है।

​किन कार्यों पर खर्च की होगी अनुमति? स्पष्ट दिशानिर्देश

​शिक्षा विभाग ने राशि के दुरुपयोग को रोकने और पारदर्शी उपयोगिता के लिए व्यय के दायरे को स्पष्ट किया है:

  1. ​शौचालय एवं स्वच्छता प्रबंधन: छात्र और छात्राओं के लिए अलग-अलग शौचालयों की मुकम्मल साफ-सफाई, टूटी सीट बदलना, फ्लश व रनिंग वाटर की बहाली, और नियमित सैनिटाइजेशन सामग्री की खरीद।
  2. ​पेयजल की उपलब्धता: आरओ सिस्टम की सर्विसिंग, चापाकल की मरम्मत, ओवरहेड वॉटर टैंक की सफाई और पाइपलाइन लीकेज को ठीक करना।
  3. ​विद्युत एवं सुरक्षा उपकरण: कक्षा-कक्षों में खराब पड़े पंखों को बदलना, सुरक्षित वायरिंग, स्विच बोर्ड की मरम्मत और मुख्य भवन में अर्थिंग की व्यवस्था।
  4. ​सफेदी एवं पेंटिंग: स्कूल भवनों, दीवारों और ब्लैकबोर्ड की मरम्मत व रंग-रोगन, जिससे बच्चों के लिए आकर्षक और प्रेरणादायी शिक्षण वातावरण (BaLA – Building as Learning Aid) तैयार हो सके।
  5. ​किचन शेड व मध्याह्न भोजन क्षेत्र: पीएम पोषण (मिड-डे मील) के तहत खाना पकाने वाले किचन शेड की स्वच्छता, जालीदार खिड़कियों की मरम्मत और बर्तनों की समुचित व्यवस्था।

​वित्तीय स्वायत्तता के साथ जवाबदेही: भ्रष्टाचार पर कैसे लगेगी लगाम?

​जब 76 हजार स्कूलों में ₹372 करोड़ जैसी विशाल राशि सीधे खर्च की जाएगी, तो सबसे बड़ा यक्ष प्रश्न वित्तीय पारदर्शिता और गुणवत्ता का खड़ा होता है। अतीत में कई बार यह देखा गया है कि स्कूल ग्रांट के नाम पर केवल कागजों पर बिल-वाउचर तैयार कर लिए जाते थे और जमीन पर काम नगण्य रहता था।

​इस बार सरकार ने त्रिस्तरीय निगरानी तंत्र स्थापित करने की रूपरेखा तैयार की है:

  • ​विद्यालय शिक्षा समिति (SMC) का अनुमोदन: विद्यालय के प्रधानाध्यापक अकेले इस राशि को खर्च नहीं कर सकेंगे। स्थानीय अभिभावकों और शिक्षकों से मिलकर बनी विद्यालय शिक्षा समिति के प्रस्ताव और अनुमोदन के बाद ही किसी कार्य का भुगतान होगा।
  • ​कायाकल्प पोर्टल और मोबाइल ऐप: कार्यों के पहले और बाद की तस्वीरें (Geo-tagged photos) कायाकल्प पोर्टल पर अपलोड करनी अनिवार्य होंगी। किस विद्यालय ने किस मद में कितना रुपया खर्च किया, इसका विवरण सार्वजनिक और डिजिटल रूप से दर्ज रहेगा।
  • ​पब्लिक फाइनेंशियल मैनेजमेंट सिस्टम (PFMS): सभी वित्तीय लेनदेन पीएफएमएस (PFMS) के माध्यम से डिजिटल रूप से किए जाएंगे, जिससे वेंडर और सामग्री आपूर्तिकर्ता के खाते में सीधे भुगतान सुनिश्चित हो सके। नकद निकासी पर कड़ा प्रतिबंध रहेगा।
  • ​अकस्मात निरीक्षण एवं सोशल ऑडिट: प्रखंड शिक्षा पदाधिकारी (BEO) और जिला स्तर के उड़नदस्ते रैंडम आधार पर स्कूलों का दौरा कर मरम्मत कार्यों की गुणवत्ता की भौतिक जांच करेंगे। घटिया सामग्री पाए जाने पर सीधे प्रधानाध्यापक और संबंधित तकनीकी कर्मी पर अनुशासनात्मक कार्रवाई होगी।

​बिहार की स्कूली शिक्षा पर क्या होगा जमीनी प्रभाव?

​इस फैसले का मनोवैज्ञानिक और व्यावहारिक असर अत्यंत व्यापक होने जा रहा है।

​सबसे पहला लाभ समय की बचत के रूप में दिखेगा। जो प्रधानाध्यापक महीने में दो-तीन दिन सिर्फ मरम्मत की अनुमतियां लेने जिला मुख्यालय के बाबुओं की चिरौरी करते थे, वे अब पूरा ध्यान बच्चों की पढ़ाई और विद्यालय प्रशासन पर केंद्रित कर सकेंगे।

​दूसरा सबसे महत्वपूर्ण प्रभाव छात्राओं की उपस्थिति पर पड़ेगा। बिहार के ग्रामीण स्कूलों में छात्राओं के ड्रॉपआउट का एक बहुत बड़ा कारण क्रियाशील और स्वच्छ शौचालयों का न होना रहा है। जब स्कूलों के पास शौचालयों की मरम्मत और दैनिक सफाई के लिए अपना बजट होगा, तो बालिकाओं के लिए स्कूल छोड़ना मजबूरी नहीं बनेगा।

​तीसरा, इससे विद्यालयों में सामुदायिक जुड़ाव मजबूत होगा। जब स्थानीय समिति यह तय करेगी कि स्कूल में क्या सुधरना चाहिए, तो विद्यालय के प्रति ग्रामीणों का अपनापन और सतर्कता दोनों बढ़ेंगे।

​बजट जारी होना एक स्वागतयोग्य प्रशासनिक शुरुआत है। असली परीक्षा अब इस बात की है कि यह 372 करोड़ रुपया बिहार के सुदूर गांवों में स्थित अंतिम स्कूल की टपकती छत को कितनी जल्दी सूखा पाता है और बंद पड़े नलों से पानी कितनी तेजी से बहना शुरू होता है।

Ravi Kumar

verifiedHead Teacher and Educational Content Writer

Expertise: MA, D.El.Ed

Head Teacher in Primary School Bihar 13 year of teaching experience in multiple government school of Bihar.

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