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auto_awesome एक नज़र में (Major Highlights)
▪️जून में राज्य भर में 46% बारिश की भारी कमी के कारण खरीफ फसलों की बुआई और धान की रोपनी में बड़ा संकट पैदा हो गया है।
▪️धान की रोपनी अपने 37 लाख हेक्टेयर के कुल लक्ष्य का मात्र 1% ही पूरी हो पाई है, जबकि गया जैसे जिलों में बारिश में 80% तक की भारी कमी दर्ज की गई है।
▪️धान बिहार की मुख्य खरीफ फसल है; इसकी रोपनी रुकने से ग्रामीण अर्थव्यवस्था, खाद्य सुरक्षा और किसानों की आजीविका पर गहरा असर पड़ता है।
▪️कृषि विभाग स्थिति पर लगातार नजर बनाए हुए है और यदि जुलाई में मानसून की स्थिति में सुधार नहीं होता है, तो 'वैकल्पिक फसल योजना' लागू की जाएगी।

मानसून की दगाबाजी से खरीफ सीजन 2026-27 की मुख्य फसल पर संकट; पटना, गया और औरंगाबाद समेत कई जिलों में हालत गंभीर, कृषि विभाग ने तैयार की वैकल्पिक योजना।
46 फीसदी कम बारिश ने जून के महीने में पूरे बिहार को झकझोर कर रख दिया है। मानसून की इस भारी बेरुखी के कारण खरीफ सीजन 2026-27 में राज्य की जीवनरेखा कही जाने वाली धान की खेती पर गंभीर संकट मंडराने लगा है। कृषि विभाग के ताजा आंकड़ों के अनुसार, सूबे के 23 जिलों में सामान्य से 50 प्रतिशत तक कम पानी गिरा है, जिसके चलते परेशान किसान आसमान की ओर टकटकी लगाए बैठे हैं।
स्थिति की गंभीरता का अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि आर्द्रा नक्षत्र के 8 दिन बीत जाने के बाद भी न तो धान का बिचड़ा सही रफ्तार से गिर पाया है और न ही खेतों में रोपनी रफ्तार पकड़ सकी है।
लक्ष्य से कोसों दूर खेती का आंकड़ा
बिहार सरकार ने इस साल 37 लाख हेक्टेयर में धान की रोपनी का महत्वाकांक्षी लक्ष्य रखा था। इसके लिए 3 लाख 77 हजार हेक्टेयर में धान का बिचड़ा तैयार किया जाना था। लेकिन जून खत्म होने तक कुल लक्ष्य की तुलना में महज 60 फीसदी ही बिचड़ा गिराया जा सका है। सबसे ज्यादा चिंताजनक स्थिति मुख्य फसल की रोपनी को लेकर है, जो अब तक कुल टारगेट का महज एक फीसदी ही पूरी हो सकी है। धान के साथ-साथ मक्का की खेती पर भी इसका सीधा असर पड़ा है; राज्य में तय 2 लाख 71 हजार हेक्टेयर के मुकाबले केवल 50 हजार हेक्टेयर यानी सिर्फ 19 फीसदी क्षेत्र में ही मक्का की बुआई हो पाई है।
पटना-गया में 80% तक कम बरसा पानी
मौसम विभाग और कृषि विभाग के क्षेत्रीय डेटा बताते हैं कि जून के महीने में पटना, गया, औरंगाबाद, सारण और गोपालगंज जिलों में मानसून ने सबसे ज्यादा निराश किया है। इन इलाकों में सामान्य से 70 से 80 फीसदी तक कम बारिश दर्ज की गई है, जिसमें गया जिला 80% की भारी कमी के साथ सबसे ऊपर है।
अगर जिलावार बिचड़ा गिराने की बात करें तो 30 जून तक:
- पश्चिम चंपारण में 100%, अररिया में 93% और किशनगंज में 90% बिचड़ा गिराया जा चुका है।
- पूर्वी चंपारण में 78%, दरभंगा में 76% और मुजफ्फरपुर में 66% काम पूरा हुआ है।
- मुंगेर की स्थिति सबसे खराब है, जहां महज 7 फीसदी ही बिचड़ा डाला जा सका है।
रोपनी के मोर्चे पर मधुबनी और जमुई 14% के साथ आगे जरूर हैं, लेकिन अररिया, बेगुसराय, गोपालगंज और सारण जैसे जिलों में यह आंकड़ा अभी सिर्फ 1 फीसदी पर रेंग रहा है।
सरकार की तैयारी और वैज्ञानिकों की सलाह
खराब होते हालातों को देखते हुए केंद्रीय कृषि एवं किसान कल्याण मंत्रालय लगातार राज्य सरकार के साथ वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग के जरिए संपर्क में है। बिहार सरकार की ओर से केंद्र को कम बारिश की जमीनी हकीकत से अवगत करा दिया गया है।आपात स्थिति के तौर पर कृषि विभाग ने अब ‘वैकल्पिक फसल योजना’ की तैयारी शुरू कर दी है ताकि अगर सूखा पड़ता है तो किसानों को दूसरी फसलों की तरफ मोड़ा जा सके।
”जिन इलाकों में नहर की सुविधा उपलब्ध है, वहां किसान किसी तरह पटवन करके अपने बिचड़े को बचा रहे हैं। लेकिन पूरी तरह बारिश पर निर्भर रहने वाले क्षेत्रों के किसानों के लिए इस समय बिचड़ा बचाना सबसे बड़ी चुनौती बन गया है। अगर देरी होती है, तो किसान जुलाई में मध्यम व कम अवधि वाली धान की वेरायटी का इस्तेमाल कर सकते हैं।”
— डॉ. प्रकाश सिंह, कृषि वैज्ञानिक
जमीन पर काम कर रहे किसानों में इसे लेकर भारी हताशा है। पटना के किसान ओम प्रकाश सिंह कहते हैं कि बिना बारिश के धान का बिचड़ा बचाना अब उनके बस से बाहर होता जा रहा है। वहीं बांका के किसान रूपेश कुमार चौधरी का मानना है कि यदि अब भी ठीक-ठाक बारिश हो जाती है तो स्थिति को कुछ हद तक सुधारा जा सकता है, लेकिन अगर मानसून आगे भी रूठा रहा तो किसानों को भारी आर्थिक नुकसान झेलना पड़ेगा।